Saturday, August 11, 2018

Umar Umar

Deo surya mandir Aurangabad देव सूर्य मंदिर औरंगाबाद

Deo Surya Mandir
Deo Surya Mandir
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बिहार के औरंगाबाद में देव सूर्य मंदिर एक ऐसा प्राचीन मंदिर है जो पुरे भारत में विख्यात है. वैसे तो आप में बहुत लोग ने बहुत  सारे सूर्य मंदिर के बारे में जानते होंगे या देखा होगा लेकिन देव के इस सूर्य मंदिर की विशेषता है की इसका दरवाजा पक्षिम तरफ है. इसका इतिहास काफी पुराना है . तो आइए जाने इस प्रख्यात और मशहूर सूर्य मंदिर के बारे में.

सूर्य मंदिर बिहार के औरंगाबाद जिले से 70 KM दक्षिण में स्थित शहर देव में स्थित है. यूँ तो इस शहर में आने के लिए कोई भी नजदीकी में न तो रेलवे स्टेशन है और नहीं कोई एअरपोर्ट है. भीर फाई आप गया रेलवे जन. या गया एअरपोर्ट से सीधे किसी कैब से आ सकते है.

देव सूर्य मंदिर देश और बिहार का धरोहर और अनूठी विरासत है. हर साल छठ पर्व पर यहाँ लाखो स्राधालू छठ करने झारखण्ड , मध्य प्रदेश , उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों से यहाँ आते है.  कहा जाता है की जो पूजा करते है उनकी मनोकामना जरुर पूरी होती है. यूँ तो सालभर देश के विभिन्न जगहों से लोग इस मंदिर में आते है और मन्नते मांगते है लेकिन छठ के मौके पे यहाँ खूब भीड़ जुटती है. मन्नत पूरी होने पर लोघ सूर्य देव को अराध्य देने यहाँ आते है.

100 फीट लम्बा है देव  सूर्य मंदिर .

इस सूर्य मंदिर की टोटल लम्बाई 100 फीट है और इसकी बनावट भी बिलकुल आकर्षक है इसका इसका उपरी भाग बिलकुल छतनुमा जैसा दिखता है. इस मंदिर का जो डिजाईन है वो बिलकुल एक तरह से nagara arts से मिलता जुलता है. बिना सीमेंट या चुना गारा का प्रयोग  किए  बिना आयताकार, वर्गाकार, आवारकार  गोलाकार तिर्भुजाकार आदि कई रूपों और आकारों में कटे गए पथरो को जोड़कर बनाया गया यह मंदिर अत्यंत आकर्षक अवन विस्मयकारी है.

काले और भूरे पथरो से निर्मित मंदिर की बनावट लगभग उरिसा के पूरी में स्थित जगन्नाथ मदिर से काफी मिलती जुलती है. मंदिर के निर्माणकाल के संभंध में मंदिर के बहार लगे एक शिलालेख अनुसार ,भगवान् विश्वकर्मा एक ही रात में देव का सूर्य मंदिर और देवकुंड का शिव मंदिर  इसे 12 लाख 16 हज़ार साल पहले त्रेता युग के बीत जाने के बाद इला पुत्र ऐल ने सूर्य मंदिर का निर्माण आरंभ करवाया था.
शिलालेख से पता चलता है की सन 2018 ईस्वी में इस पौरान्विक मंदिर के निर्माण काल को एक लाख पचास हज़ार अठारह वर्ष पुरे हो गए .

मंदिर बनने को लेकर अनेक धारणा है पर जनश्रुतियों के मुताबिक, एक राजा ऐल एक बार देव इलाके के जंगल में शिकार खेलने गए थे. शिकार खेलने के समय उन्हें प्यास लगी. उन्होंने अपने आदेशपाल को लोटा भर पानी लाने को कहा. आदेशपाल पानी की तलाश करते हुए एक पानी भरे गड्ढे के पास पहुंचा. वहां से उसने एक लोटा पानी लेकर राजा को दिया. राजा के हाथ में जहां-जहां पानी का स्पर्श हुआ, वहां का कुष्ठ ठीक हो गया.


राजा बाद में उस गड्ढे में स्नान किया और उनका कुष्ठ रोग ठीक हो गया. उसके बाद उसी रात जब राजा रात में सोए हुए, तो सपना आया कि जिस गड्ढे में उन्होंने स्नान किया था, उस गड्ढे में तीन मूर्तियां हैं. राजा ने फिर उन मूर्तियों को एक मंदिर बनाकर स्थापित किया.


कार्तिक एवं चैत महीने में छठ करने कई राज्यों से लाखों की संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं. यहां मंदिर के समीप स्थित सूर्यकुंड तालाब का विशेष महत्व है. इस सूर्यकुंड में स्नान कर व्रती सूर्यदेव की आराधना करते हैं.


यहाँ प्रत्येक दिन सुबह चार बजे भगवान को घंटी बजाकर जगाया जाता है. उसके बाद पुजारी भगवान को नहलाते हैं, ललाट पर चंदन लगाते हैं, नया वस्त्र पहनाते हैं. यह परंपरा आदि काल से चली आ रही है. भगवान को आदित्य हृदय स्त्रोत का पाठ सुनाया जाता है.



देव का सूर्य मंदिर स्थापत्य कला का एक बेहद उम्दा मिशल है. एक सांचे में ढले और कला की आत्मा से तरासे गए पत्रों का यह मंदिर अद्भुत है. पत्रों की सजी हुई शिलाए सुन्दर नकाशी और अनुपम कलाक्ती  मन को बरबस  आकर्षण देती है. 

इसका सोने के कलश लोगो को दूर से ही अपनी ओर मन को आकर्षित करता है . वैसे इस मंदिर को और भी आधुनिक ढंग से आकर्षित करने की और भी जरुरत है . और ऐसा नहीं है की इस पर जयादा धयान नहीं दिया जाता है.  समय – समय पर मंदिर का जीनोदावार होता रहा है. अभी 1985 में औरंगाबाद के श्रीगुपता जी और देव सूर्य मंदिर के सहयोगी बाबा के सहयोग से मंदिर के आंगन का पक्कीकरण किया गया है.

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