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Thursday, September 6, 2018

Umar Umar

Raja Kila Deo Dev fort aurangabad देव किला औरंगाबाद

Dev kila
Deo fort Raja kila
Deo fort देव किला Raja kila Deo Aurangabad history in hindi
दोस्तों आपने अपने औरंगाबाद जिले के प्राचीन  इतिहास के बारे में अगर आप ने अध्यन किया होगा तो आपको कई ऐसे अनेक इतिहास जानने को मिला होगा जैसे प्राचीन धार्मिक स्थल (देव सूर्य मंदिर , उमगा सूर्य मंदिर, देवकुण्ड धाम, अमझर शरीफ मजार , ऐतिहासिक धरोहर में दाउदनगर किल्ला इत्यादि  )जो  औरंगाबाद को गर्वशाली बनाता है।
पर इसके अलावे और भी ऐसे ऐतिहासिक धरोहर है जिसे सायद ही इसे लोगो तक प्रसार किया हो या लोग इसे अच्छी तरह से जानते होंगे.


देव किला का इतिहास History of Deo fort Dev killa

जी दोस्तो हम बात कर रहे है औरंगाबाद जिले के देव में मौजूद देव किले के बारे में. इस किले का इतिहास काफी पुराना है. यहां राजा महाराजा का शासन चलता था.

बताना चाहूंगा कि ये राजपूत परिवार के सिसोदिया वंस से जुड़ी हुई है. ये वर्णन इतिहास में मिलती है कि देव किला का सबसे अंतिम राजा जगनाथ जी थे . जो काफी लंबे समय तक अपने राज्य में शांति और वह प्रजा लोगो के साथ शांति के साथ राज्य का जिम्मा अपने हाथ मे लेकर शासन किया. उनका कोई भी अपना संतान नही था. उनके देहांत के बाद बारी आई कि अब राज्य का जिम्मा कौन संभाले तो ये जिम्मेदारी उनकी बीवी को लेनी थी. उनकी दो पत्नियां थी जेसमे से राज्य का जिम्मा उनकी छोटी पत्नी ने संभाली

उनकी छोटी पत्नी ने अपने राज्य पर देश को स्वत्रंत होने 1947 तक किया. भारत को इंडिपेंडेंट देश बनने के बाद उस वक्त के देव राज्य के अटॉर्नी जॉर्नल मुनेश्वर सिंह ने देश मे विलय ( मर्ज ) के लिए हस्ताक्षर किया था और इस तरह से देव राज्य भारत देश मे विलय हो गया.

देव के राजा जगनाथ जी के देहांत के बाद राज्य का कार्य भार उनकी पत्नी ने ली थी जिनका कोई भी संतान नही था. उन्होंने अपनी बहन से एक बच्चा गोद भी ली थी. उनकी दो बहन थी पहली बहन का नाम बड़ी मानी था और दूसरी बहन का नाम छोटी मानी .


आज भी अगर आप देव किले जाते है तो आप को देव का किला जरूर देखने को मिलेगा इसके अलावा देव किले के अलावा यहां एक विद्यायल भी जो उसी समय की रानी ने अपने राज्य की भूमि विद्यायल बनाने के लिए नाम कराई थी.

विद्यालय की स्थापना का है अपना इतिहास : विद्यालय की स्थापना का एक अपना इतिहास है. सन 1938 के नवंबर में देव के जिला बोर्ड के सरकारी अस्पताल के डॉक्टर अश्विनी कुमार चटर्जी के प्रयास से देव के गण्यमान्य व्यक्तियों की एक सार्वजनिक सभा हुई. इसमें नगर के शिक्षा प्रेमियों के समक्ष यह प्रस्ताव रखा गया कि देव के स्व राजा जगन्नाथ प्रसाद सिंह 'किंकर' के स्मृति में एक हाइस्कूल खोला जाये. इसका लोगों ने समर्थन किया.

फिर प्रबंधकारिणी समिति के सदस्यों के अनुरोध पर बड़ी रानी विश्वनाथ कुमारी ने दिनांक सात जनवरी 1938 को सात एकड़ 13 डिसमिल जमीन के साथ-साथ अपने भूतपूर्व अंगेरज मैनेजर जेसी राइट के बंगले को विद्यालय के नाम से दान कर रजिस्ट्री कर दी. इसके बाद पहले प्रधानाध्यापक के रूप में कंठी प्रसाद देशान्धी को नियुक्त किया गया और इस तरह विद्यालय में पठन-पाठन कार्य प्रारंभ हुआ. विद्यालय में आठवीं, नौवीं व 10वीं की विभागीय स्वीकृति क्रमश: 1938, 39, 40 में मिली. अब इस विद्यालय में प्लस टू तक की शिक्षा बच्चों को उपलब्ध करायी जाती है।
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Saturday, September 1, 2018

Umar Umar

Umga sun temple umga most points of interest of aurangabad

Umga sun temple
Umga surya mandir
Umga mandir Madanpur Mnpur umga temple बिहार के औरंगाबाद वास्तव में कई ऐतिहासिक और धार्मिक स्थल है जिन्हें सायद उतना लोगो तक प्रसार नही किया गया जितना जरूरी थी। औरंगाबाद में ऐसे कई धार्मिक स्थल है जहाँ सालो भर यहाँ सर्द्धालु मन्नत लेके आते है या घूमने आते है जैसे काफी ऐतिहासिक देव सूर्य मंदिर या देवकुण्ड धाम या मुस्लिम धर्म के मानने वालों अमझर शरीफ में बाबा सैयदना दादा का मजार। ये सब धार्मिक स्थलों को कोई पहचान की जरूरत नही है।

मगर इन्ही में से प्राचीन उमगा में सूर्य मंदिर भी है जो सायद ही काफी लोगो को मालूम होगा। अधिकतर लोग इस मंदिर का प्राचीन इतिहास नही जानते है साथ ही इस मंदिर की किया खासियत है इससे भी अपडेट नही है तो आइए जानते है इस प्राचीन सूर्य मंदिर के बारे में ।

दरसल ये प्राचीन सूर्य मंदिर जो उमगा में है औरंगाबाद  जिला मुख्‍यालय से 27 कि0‍मी0 की दूरी पर अवस्थित है और  ग्रैण्‍ड ट्रंक रोड जिसे अधिकतर लोग( जीटी रोड के नाम से भी जानते है) से 1.5 कि0मी0 दक्षिण की ओर एवं देव सूर्य मंदिर से से 12कि0मी0 की दूरी पर स्थित है जो कि औरंगाबाद जिले और  बिहार राज्य की सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण पुरातात्विक धरोहरों में से एक है।



वैसे बताना चाहूंगा कि  19वीं एवं 20वीं शताब्‍दी के प्रायः सभी नामचिन पुरातत्ववेताओं ने यहॉ के मंदिर श्रृंखलाओं का दौर किया था और सर्वेक्षण भी किया तथा उसे अपने सर्वेक्षण प्रतिवेदन में महत्‍वपूर्ण स्‍थान दिया है  आपको मालूम है  मेजर किट्टो ने सन् 1847ई0 श्री कनिंघम ने 1876ई0 जे0डी0 बेगलर ने 1872 ई0 ब्‍लॉच ने 1902 ई0 में इसका पुरातात्‍विक सर्वेक्षण किया तथा इसे अपने सर्वेक्षण प्रतिवेदनों में महत्‍वपूर्ण स्‍थान दिया था। परंतु इतने सर्वेक्षण के बावजूद भी ये प्रसिद्ध मंदिर नेताओं के उपेक्षा का शिकार है। हालांकि बिहार के वर्तमान में मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार ने इस प्राचीन धरोहर में  यात्रा किया था और यहां आकर माना था कि मदनपुर ब्लॉक के उमगा पर्यटकों के लिये अच्छी जगह है। यहां के पहाड़ियों में ऐसी  हरियाली है  की सब की मन मोह सकता है। और उन्होंने वादा किया था की उमगा को धार्मिक पर्यटकों की सूची में जल्द ही सामिल कर लिया जाएगा।

वैसे उमगा जगह काफी पहाड़ियों वाला है उमगा  के  पहाड़ियों पर कई मंदिर एवं मंदिरों के अवशेष मिलाकर मंदिर ऋखला है इसकी पश्चिमी ढलान पर पूर्वाभिमुख वृहद मंदिर है जो देव मंदिर के ही समरूप है (इसकी लम्‍बाई 68.60फीट x 53 फीट एवं उचॉई 60 फीट) गर्भगृह के अतिरिक्‍त यहॉ भी मण्‍डप है जो सुडौल एकाश्‍मक स्‍तम्‍भों के सहारे है।  मंदिर में आप जैसे ही प्रवेश आप करेंगे तो  प्रवेश करने के बाद द्वार के बांयी तरफ एक शिवलिंग एवं भगवान गणेश की मूर्ति भी है। गर्भगृह में भगवान सूर्य की मूर्ति है मंदिर के दाहिने तरफ एक वृहद शिलालेख है सभी मूर्तियां एवं शिलालेख काले पत्‍थर से बने है जो पालका‍लीन मूर्ति कला के उत्कृष्‍ट नमूने है मेजर किट्टो जो यहां भारतीय पुरातत्व विभाग के टीम में पहले व्यक्ति थे जो यहां अध्ययन करने को आये थे उन्होंने यहॉ के शिलालेख का काफी गहराई से  अध्‍ययन किया था काफी अध्यन करने के बाद उसका अनुवाद अपने सर्वेक्षण प्रतिवेदन में दिया है


मेजर किट्टो के अध्ययन के अनुसार
 इस अभिलेख में उमगा के स्‍थानीय शासकप्रमुख की वंशावली है जो अपने को चन्‍द्रवंशी यां सोमवंशी कहते थे इस वंशावली की शुरूआत भूमिपास से प्रारम्‍भ होकर भैरवेन्‍द्र तक आती थी। मंदिर की स्थापना किस ने की ऐसे में कई लोग ने अलग अलग रे देते है लेकि पुरातत्व विभाग के अनुसार  राजा भैरवेन्‍द्र ने ही इस मंदिर की स्‍थापना की थी इनके द्वारा मंदिर में कृष्‍ण बलभद्र एवं सुभद्रा की मूर्तियां स्‍थापित करने का उल्‍लेख है

इस मुख्‍य मंदिर के अतिरिक्‍त उमगा पहाड पर कई मंदिर जिनमें प्रमुख सहस्‍त्र शिवलिंग एवं ध्‍वंस शिवमंदिर है उमगा पहाड की श्रृंखालाओं पर मंदिर  निर्माण  की कला एवं तकनीक का भी अध्‍ययन किया जा सकता है उमगा के मंदिरों का निर्माण यहॉ के स्‍थानीय पत्‍थरों से ही किया गया था।



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Saturday, August 11, 2018

Umar Umar

Deo surya mandir Aurangabad देव सूर्य मंदिर औरंगाबाद

Deo Surya Mandir
Deo Surya Mandir
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बिहार के औरंगाबाद में देव सूर्य मंदिर एक ऐसा प्राचीन मंदिर है जो पुरे भारत में विख्यात है. वैसे तो आप में बहुत लोग ने बहुत  सारे सूर्य मंदिर के बारे में जानते होंगे या देखा होगा लेकिन देव के इस सूर्य मंदिर की विशेषता है की इसका दरवाजा पक्षिम तरफ है. इसका इतिहास काफी पुराना है . तो आइए जाने इस प्रख्यात और मशहूर सूर्य मंदिर के बारे में.

सूर्य मंदिर बिहार के औरंगाबाद जिले से 70 KM दक्षिण में स्थित शहर देव में स्थित है. यूँ तो इस शहर में आने के लिए कोई भी नजदीकी में न तो रेलवे स्टेशन है और नहीं कोई एअरपोर्ट है. भीर फाई आप गया रेलवे जन. या गया एअरपोर्ट से सीधे किसी कैब से आ सकते है.

देव सूर्य मंदिर देश और बिहार का धरोहर और अनूठी विरासत है. हर साल छठ पर्व पर यहाँ लाखो स्राधालू छठ करने झारखण्ड , मध्य प्रदेश , उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों से यहाँ आते है.  कहा जाता है की जो पूजा करते है उनकी मनोकामना जरुर पूरी होती है. यूँ तो सालभर देश के विभिन्न जगहों से लोग इस मंदिर में आते है और मन्नते मांगते है लेकिन छठ के मौके पे यहाँ खूब भीड़ जुटती है. मन्नत पूरी होने पर लोघ सूर्य देव को अराध्य देने यहाँ आते है.

100 फीट लम्बा है देव  सूर्य मंदिर .

इस सूर्य मंदिर की टोटल लम्बाई 100 फीट है और इसकी बनावट भी बिलकुल आकर्षक है इसका इसका उपरी भाग बिलकुल छतनुमा जैसा दिखता है. इस मंदिर का जो डिजाईन है वो बिलकुल एक तरह से nagara arts से मिलता जुलता है. बिना सीमेंट या चुना गारा का प्रयोग  किए  बिना आयताकार, वर्गाकार, आवारकार  गोलाकार तिर्भुजाकार आदि कई रूपों और आकारों में कटे गए पथरो को जोड़कर बनाया गया यह मंदिर अत्यंत आकर्षक अवन विस्मयकारी है.

काले और भूरे पथरो से निर्मित मंदिर की बनावट लगभग उरिसा के पूरी में स्थित जगन्नाथ मदिर से काफी मिलती जुलती है. मंदिर के निर्माणकाल के संभंध में मंदिर के बहार लगे एक शिलालेख अनुसार ,भगवान् विश्वकर्मा एक ही रात में देव का सूर्य मंदिर और देवकुंड का शिव मंदिर  इसे 12 लाख 16 हज़ार साल पहले त्रेता युग के बीत जाने के बाद इला पुत्र ऐल ने सूर्य मंदिर का निर्माण आरंभ करवाया था.
शिलालेख से पता चलता है की सन 2018 ईस्वी में इस पौरान्विक मंदिर के निर्माण काल को एक लाख पचास हज़ार अठारह वर्ष पुरे हो गए .

मंदिर बनने को लेकर अनेक धारणा है पर जनश्रुतियों के मुताबिक, एक राजा ऐल एक बार देव इलाके के जंगल में शिकार खेलने गए थे. शिकार खेलने के समय उन्हें प्यास लगी. उन्होंने अपने आदेशपाल को लोटा भर पानी लाने को कहा. आदेशपाल पानी की तलाश करते हुए एक पानी भरे गड्ढे के पास पहुंचा. वहां से उसने एक लोटा पानी लेकर राजा को दिया. राजा के हाथ में जहां-जहां पानी का स्पर्श हुआ, वहां का कुष्ठ ठीक हो गया.


राजा बाद में उस गड्ढे में स्नान किया और उनका कुष्ठ रोग ठीक हो गया. उसके बाद उसी रात जब राजा रात में सोए हुए, तो सपना आया कि जिस गड्ढे में उन्होंने स्नान किया था, उस गड्ढे में तीन मूर्तियां हैं. राजा ने फिर उन मूर्तियों को एक मंदिर बनाकर स्थापित किया.


कार्तिक एवं चैत महीने में छठ करने कई राज्यों से लाखों की संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं. यहां मंदिर के समीप स्थित सूर्यकुंड तालाब का विशेष महत्व है. इस सूर्यकुंड में स्नान कर व्रती सूर्यदेव की आराधना करते हैं.


यहाँ प्रत्येक दिन सुबह चार बजे भगवान को घंटी बजाकर जगाया जाता है. उसके बाद पुजारी भगवान को नहलाते हैं, ललाट पर चंदन लगाते हैं, नया वस्त्र पहनाते हैं. यह परंपरा आदि काल से चली आ रही है. भगवान को आदित्य हृदय स्त्रोत का पाठ सुनाया जाता है.



देव का सूर्य मंदिर स्थापत्य कला का एक बेहद उम्दा मिशल है. एक सांचे में ढले और कला की आत्मा से तरासे गए पत्रों का यह मंदिर अद्भुत है. पत्रों की सजी हुई शिलाए सुन्दर नकाशी और अनुपम कलाक्ती  मन को बरबस  आकर्षण देती है. 

इसका सोने के कलश लोगो को दूर से ही अपनी ओर मन को आकर्षित करता है . वैसे इस मंदिर को और भी आधुनिक ढंग से आकर्षित करने की और भी जरुरत है . और ऐसा नहीं है की इस पर जयादा धयान नहीं दिया जाता है.  समय – समय पर मंदिर का जीनोदावार होता रहा है. अभी 1985 में औरंगाबाद के श्रीगुपता जी और देव सूर्य मंदिर के सहयोगी बाबा के सहयोग से मंदिर के आंगन का पक्कीकरण किया गया है.

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