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Sunday, November 11, 2018

Aurangabadian

आस्था का केन्द्र के रूप में प्राख्यात हसपुरा का तालाब वर्षों से सूर्योपासना का केंद्र रहा है


हसपुरा औरंगाबाद धार्मिक मान्यताओं से प्रसिद्ध व आस्था का केन्द्र के रूप में प्राख्यात हसपुरा का तालाब वर्षों से सूर्योपासना का केंद्र रहा है। यह तालाब चौराही रोड में स्थित है। छठ के लिए प्रख्यात होने के कारण छठिहारा तालाब के नाम से प्रसिद्ध है। हसपुरा पंचायत एवं आसपास के श्रद्धालु इसी तालाब पर कार्तिक व चैत में छठव्रत करते हैं।


छठ पर्व में तालाब के घाट पर श्रद्धालुओं की भीड़ रहती है। यहां वर्षों से सूर्य के अर्घ्य देने की परंपरा चली आ रही है। श्रद्धालु इन दिनों तालाब की सफाई में लगे हैं। तालाब के पास में ही करोड़ों की लागत से एक भव्य सूर्यकुंड तालाब निर्माण हो रहा है। छठ के मौके पर पहला अर्घ्य को मंदिर के समीप प्रत्येक वर्ष भजन कीर्तन का आयोजन होता है। मान्यता है कि सच्चे मन से यहां जो भी श्रद्धालु छठ व्रत करते हैं। उनके द्वारा मांगी गईं मन्नत अवश्य पूरी होती है।


कार्तिक छठ के मौके पर भीड़ होती है। बुजुर्ग ग्रामीण बताते हैं कि 70 वर्ष पूर्व हसपुरा में हैजा, प्लेग व मलेरिया फैल गई। लोगों की मौत होने लगी। गांव में हाहाकार मच गया। लोग डरने लगे। ग्रामीण को समझ से बाहर हो गया। रोगों की मुक्ति के लिए ग्रामीण इधर उधर भटकने लगे। किसी के कहने पर वहां पर तालाब निर्माण कराया गया।


जब से उस तालाब में मन्नत मानकर छठ प्रारंभ हुआ सभी रोग धीरे धीरे समाप्त हो गया। तब से आज तक वहां छठ होने की परंपरा कायम है। श्रद्धालु बताते हैं कि अन्य तालाब व घाटों से इसका महत्व अधिक है जिस कारण भीड़ होती है। तालाब के कुछ जगहों पर घाट का निर्माण हुआ है। विधायक मनोज शर्मा के एच्छिक निधि से भी घाट का निर्माण हुआ है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि चारों तरफ पूरे तालाब में घाट निर्माण हो जाए


तो श्रद्धालुओं को परेशानी दूर हो जाएगी। विधायक ने कहा है कि तालाब और घाट धर्म व श्रद्धा से जुड़ा हुआ है। दैनिक जागरण।
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Tuesday, January 16, 2018

Aurangabadian

Haspura millennium cup cricket tournament| हसपुरा मिलेनियम कप टूर्नामेंट

Haspura millennium cup
हसपुरा मिलेनियम कप टूर्नामेंट सेरेमनी

हसपुरा में होने वाले मिलेनियम क्रिकेट टूर्नामेंट जो काफी लंबे समय से आयोजन होता रहा है। आयोजन कर्ता काफी उच्चस्तरीय मैच कराते है साथ मे दर्शक भी काफी आनंद लेते है। जी हां इस टूर्नामेंट के लिए जनवरी का महीना आते ही जहां पूरी दुनिया में नए साल का इंतजार शुरू हो जाता है, लेकिन  इसी औरंगाबाद जिले में एक ऐसी जगह जहां क्रिकेट प्रेमी लोग एक के बजाय 14 जनवरी का इंतजार करते हैं. जैसे-जैसे यह दिन नजदीक आता है, हर चौक-चौराहे, बाजार, खेत-खलिहान, दुकान-दफ्तर पर एक ही चर्चा होती है, मिलेनियम कप का ।
दरअसल, 14 जनवरी को हसपुरा में हर साल क्रिकेट का महा संग्राम शुरू होता है जिसमे  हर साल लगभग दस से बारह टीमों काफी दूर दूर  दूसरे जिले की टीमें भाग लेती है। इस सीरीज का ऐसा क्रेज है कि लोग खुद बखुद उस रोज आयोजन स्थल की तरह चले आते हैं. न सिर्फ उस गांव के बल्कि आस-पास के कई गांवों के लोगों के लिये यह एक यादगार मौका होता है. ये सीरीज 14 जनवरी यानी के इस दिन पर्व शकरात के अवशर  से शुरू हो के 26 जनवरी तक चलता है। 26 जनवरी को ग्रैंड फाइनल मैच का आयोजन होता है जिसमे दो टीमें जो फाइनल में पहुचती है वो खेलती है। इस फाइनल मैच में विजेता टीम को एक भव्य कप दिया जाता है। इतना ही नही मैच में खिलाड़ियों के द्वारा हर एक रन चौके छक्के विकेट हैट्रिक लेने पे हजारो रुपये का इनाम भी दिया जाता है। ये आयोजन वास्त्व में ग्रामीण इलाके में क्रिकेट की जो लोकप्रयिता है उसका बढ़वा देना है। ग्रामीण इलाके में कोई बड़ा आयोजन नही होता । इस आयोजन से लोगो को एक बढ़िया एंटरटेनमेंट का समय मिल जाता है। वैसे लोग मैच तो अपने टीबी और रेडियो पर ही देखे होंगे लेकिन इस आयोजन से उन्हें लाइव क्रिकेट मैच देखने को तो मिल जाता है।

यह सीरीज पिछले 16 वर्षों से हो रहा है पहले ये हाई स्कूल के छोटी फील्ड पे होती थी लेकिन इस साल से बड़ी फील्ड पे आयोजन हो रही है। इस मिलेनियम क्रिकेट मैच का आगाज आज से कई साल पहले शुरू किया गया था । पहला मैच सन 2001 में हुआ जिसमें दो जो टीम फाइनल में पहुँची वो हसपुरा और तरारी थी। उस मैच में हसपुरा ने 7 रानो जीत हासिल की थी लेकिन हसपुरा ने 2011 से कोई भी फाइनल मैच नही जीती है। मैच का स्टास्टिक नीचे दिए गए है।

 हसपुरा और आसपास के इलाके में भीड़ के हिसाब से स्थानीय कुंभ का दर्जा हासिल है. इस समारोह में न सिर्फ हसपुरा प्रखंड, बल्कि गोह, कलेर, दाउदनगर, अरवल, ओबरा आदि प्रखंड के लोग भी बहुत बड़ी संख्या में शामिल होते हैं.
इस नए साल के नए सीजन के मैच शेड्यू

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Saturday, December 30, 2017

Umar Umar

Annual RamRup Mehta football match to organizing at Haspura aurangabad| सालाना दो जनवरी को होने वाले हसपुरा में फुटबॉल मैच।

Ramrup Mehta football match ceremony.
दो जनवरी को हसपुरा में हर साल होने वाला फुटबॉल मैच

दिसंबर का महीना आते ही जहां पूरी दुनिया में नए साल का इंतजार शुरू हो जाता है, परंतु इसी धरती का एक ऐसा हिस्सा भी है, जहां लोग एक के बजाय दो जनवरी का इंतजार करते हैं. जैसे-जैसे यह दिन नजदीक आता है, हर चौक-चौराहे, बाजार, खेत-खलिहान, दुकान-दफ्तर पर एक ही चर्चा होती है, इस बार क्या होने वाला है. यह इलाका है औरंगाबाद जिले का हसपुरा प्रखंड.
 दरअसल, दो जनवरी को हसपुरा में हर साल रामरूप मेहता महोत्सव का आयोजन होता है. यह आयोजन एक स्थानीय जननायक रामरूप मेहता की याद में होता है. उनके निधन के 37 साल बाद भी उनके नाम का ऐसा क्रेज है कि लोग खुद बखुद उस रोज आयोजन स्थल की तरह चले आते हैं. न सिर्फ उस गांव के बल्कि आस-पास के कई गांवों के लोगों के लिये यह एक यादगार मौका होता है. इस मौके पर फुटबाल मैच होता है और अच्छा काम करने वालों को पुरस्कृत किया जाता है.
यह समारोह पिछले 37 वर्षों से हो रहा है और अब यह वहां की लोक परंपरा का हिस्सा बन चुका है. रामरूप मेहता महोत्सव को हसपुरा और आसपास के इलाके में भीड़ के हिसाब से स्थानीय कुंभ का दर्जा हासिल है. इस समारोह में न सिर्फ हसपुरा प्रखंड, बल्कि गोह, कलेर, दाउदनगर, अरवल, ओबरा आदि प्रखंड के लोग भी बहुत बड़ी संख्या में शामिल होते हैं. इलाके के तमाम जागरूक लोग उस श्रद्धांजलि समारोह में शामिल होना अपना फर्ज समझते हैं. नई पीढ़ी अपनी पिछली पीढ़ी से समारोह में शामिल होने और इसे निबाहने की परंपरा ग्रहण कर रही है.
रामरूप मेहता अपने इलाके के सर्वाधिक लोकप्रिय और प्रतिष्ठित नेता थे. इलाके के सभी समुदायों में उनकी गहरी पैठ थी. जनता उन पर जान छिड़कती थी. रामरूप मेहता हर गलत काम का विरोध करते थे, चाहे उसे करने वाला जो भी रहे. ऐसे में कुछ धूर्त नेताओं ने उनके खिलाफ साजिश रचना शुरू कर दिया. उनके घर में आग लगवाई गई तो कभी डकैती करवाई गई. परंतु, रामरूप मेहता हर मुसीबत के बाद और भी मजबूत और लोकप्रिय होते चले गए. अंत में विरोधियों ने उनकी हत्या की साजिश रची. एक हत्यारे गिरोह के माध्यम से उनके गांव बिरहारा में 16 मार्च 1980 की सुबह उनकी हत्या करवा दी. अपने प्रिय नेता की हत्या की खबर सुनते ही लोगों की आंखों में खून उतर आया. लोग हत्या कर भाग रहे हत्यारो पर टूट पड़े. निहत्थे ही लोगों ने पांच सशस्त्र हत्यारों को उसी समय पीट-पीटकर मार डाला.
उनके करीबी साथी रहे जदयू नेता राजेंद्र सिंह जॉर्ज बताते हैं कि रामरूप मेहता की हत्या के बाद उनके साथी और पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर की प्रेरणा से उनके साथियों और शिष्यों ने उनकी स्मृति को अक्षुण्ण रखने की योजना बनाई. रामरूप मेहता के जन्मदिवस दो जनवरी पर समारोह करने का फैसला किया और 1981 से प्रत्येक दो जनवरी को यह समारोह आयोजित किया जा रहा है. उस दिन एक फुटबॉल मैच कराने का निर्णय भी लिया गया था, जो अब तक जारी है. पूरे इलाके के लोग अपने प्रिय नेता को श्रद्धांजलि देने उमड़ते हैं.
जॉर्ज याद करते हैं कि 1977 में पूर्व मुख्यमंत्री सत्येंद्र नारायण सिन्हा रामरूप मेहता की लोकप्रियता सुनकर उनसे मिलने खुद हसपुरा पहुंचे थे और कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ने का आग्रह किया था, लेकिन रामरूप मेहता ने समाजवादी राजनीति के प्रति प्रतिबद्धता के कारण टिकट विनम्रता पूर्वक ठुकरा दिया. यहां तक कि उनकी अपनी पार्टी ने भी जब टिकट ऑफर किया तो उन्होंने सदन के बजाय समाज में काम करने को प्राथमिकता दी.
इस समारोह की नकल करने का भी प्रयास होता रहा है. इस गलतफहमी में कि यह जनसैलाब फुटबॉल मैच के कारण उमड़ता है. कई बार दो जनवरी के पहले या बाद में फुटबॉल मैच का आयोजन किया गया. दूसरे राज्यों से भी नामचीन फुटबॉल टीमें बुलवाई गर्इं. परंतु, रामरूप मेहता महोत्सव के 10वें हिस्से के बराबर भी लोग जमा नहीं हो सके. दो जनवरी को भीड़ का आलम यह होता है कि आयोजन स्थल क्रीड़ा स्थल हसपुरा के अतिरिक्त उसकी बाउंड्री पर, पेड़ों पर, अगल-बगल के घरों की छतों पर, गाड़ियों की छतों पर, सड़क पर यानी जहां तक निगाह जा सकती है, वहां तक लोग भरे होते हैं. इसके बावजूद हजारों लोग कहीं जगह नहीं मिल पाने के कारण मायूस लौट जाते हैं.
रामरूप मेहता औरंगाबाद जिले में समाजवादी आंदोलन और राजनीति के सबसे नामचीन योद्धा थे. हालांकि, उनका सामाजिक और सार्वजनिक जीवन काफी पहले से ही शुरू हो चुका था. उनके पुत्र सर्वोदय मेहता बताते हैं कि जब वे हसपुरा हाई स्कूल मे छात्र थे, तभी वहां विनोबा भावे अपने भूदान आंदोलन के सिलसिले में आए  थे. रामरूप मेहता उनसे प्रभावित हुए और अपने पिता रामप्रसन्न मेहता से आज्ञा लेकर विनोबा के साथ चल पड़े. उसी आंदोलन में उनकी भेंट लोकनायक जयप्रकाश नारायण से हुई. जब लोकनायक ने सर्वोदय आंदोलन शुरू किया तो रामरूप मेहता अग्रणी कार्यकर्ता के रूप में सामने आए. लंबे समय तक सर्वोदय आश्रम से लेकर ग्राम निर्माण मंडल तक से जुड़े रहे. उसी दौरान वे प्रखर समाजवादी नेता राममनोहर लोहिया के संपर्क में आए और उनकी संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी से जुड़ गए.
उन्होंने औरंगाबाद में समाजवादी कार्यकर्ताओं की लंबी कतार खड़ी कर दी और समाजवादी आंदोलन का झंडा ऊंचा करने में दिन-रात जुट गए. पार्टी के दाम बांधो, भूमि सुधार आंदोलन का बखूबी नेतृत्व किया. इस दौरान तब के सभी बड़े समाजवादी नेताओं मधु लिमये, कर्पूरी ठाकुर, रामानंद तिवारी आदि के साथ उनके संबंध गहरे होते चले गए. आपातकाल के दौर में वे लंबे समय तक भूमिगत रहकर जेपी आंदोलन को संचालित करते रहे. उनके साथी बाबूचंद पासवान बताते हैं कि रामरूप मेहता ने अपने इलाके में सैंकड़ों भूमिहीनों को जमीन दिलवाई. कई स्कूल खुलवाए. सवर्णों और दलितों-पिछड़ों की खाई को पाटने में सक्रिय रहे. आपसी झगड़ों को सामाजिक तरीके से सुलझाया. बाढ़ हो या आगजनी, प्रशासन को सूचना पहुंचने तक रामरूप मेहता घटनास्थल पर अपने साथियों के साथ राहत सामग्री लेकर पहुंच जाते थे.
दो जनवरी 1936 को जन्मे रामरूप मेहता इलाके के गरीबों, दलितों, वंचितों का मसीहा बनते चले गए. इलाके के हर व्यक्ति और परिवार के सुख-दुख के साथ जुड़ गए. स्थानीय शिक्षाविद सर्वेश सिंह बताते हैं कि शिक्षा से रामरूप मेहता जितना लगाव किसी बिरले नेता को ही होगा. दुनिया के तमाम साहित्य, दर्शन और धर्मों का उन्होंने गहरा अध्ययन किया था. सर्वेश कहते हैं कि उनके जैसा निर्भीक व्यक्ति लाखों में एक होता है. उन्हें कभी किसी ने न तो भयभीत देखा और न ही गलत के समझौता करते. वे किसी भी सच को कहने का साहस रखते थे.
रामरूप मेहता के सहयोगी हरेश कुमार बताते हैं कि 1977 में संसोपा के विलय के बाद वे लोकदल के साथ जुड़ गए और अंतिम सांस तक उसी के साथ समाजवादी लक्ष्यों को पूरा करने में जुटे रहे. पूर्व प्रमुख और उनके साथी आरिफ रिजवी बताते हैं कि रामरूप मेहता की राजनीति से आज के नेताओं को सीख लेनी चाहिए. उन्होंने कहा कि वैचारिक मतभेद के बावजूद उनका तमाम दलों के कार्यकर्ताओं के साथ गहरा रिश्ता और अपनत्व था. चाहे वामपंथी विधायक रामशरण यादव हों या दूसरे कांग्रेसी नेता. अपने दल के तो वे मुख्य आधार ही थे.
शोषित समाज दल के अध्यक्ष जयराम प्रसाद ने एक बार कहा था कि एक बार वे रामरूप मेहता के क्षेत्र से ही विधानसभा का चुनाव लड़ रहे थे. यह तय था कि वे जिस उम्मीदवार का समर्थन करते, उसकी जीत निर्विवाद थी. रामरूप मेहता ने उनके बजाय समाजवादी आंदोलन और आदर्श राजनीति की प्रतिबद्धता के कारण अपने दल के उम्मीदवार रामविलास यादव का समर्थन किया. हालांकि तब उनका शोषित समाज दल के संस्थापक बिहार लेनिन जगदेव प्रसाद के साथ बहुत ही गहरा रिश्ता था. ऐसा कि जगदेव प्रसाद उस इलाके में रहते तो अपने किसी कार्यकर्ता के बजाय रामरूप मेहता के यहां ठहरते थे.
रालोसपा के औरंगाबाद जिला अध्यक्ष राजीव कुमार उर्फ बबलू कहते हैं कि जब भी आदर्श समाज और राजनीति की बात होगी, रामरूप मेहता से प्रेरणा लेने की जरूरत पड़ेगी. उन्हें कभी भूला नहीं जा सकता. वे पूरे इलाके में सबके दिलों में राज करते हैं. पूर्व मुखिया विजय कुमार अकेला कहते हैं कि आज रामरूप मेहता क्या होते, यह सिर्फ अनुमान लगाया जा सकता है, लेकिन इतना तय है कि अगर वे होते तो राजनीति का स्तर इतना नीचा नहीं होता और गरीब व वंचित तबका इतना असहाय नहीं होता.
आयोजन समिति के अभय कुमार व मंणिकांत पांडेय ने कहा कि रामरूप मेहता के नाम पर चार सम्मान दिये जा रहे हैं. कला, साहित्य, खेल और पत्रकारिता के क्षेत्र में बिहार में चार उल्लेखनीय कार्य करने वाले लोगों को ये सम्मान दिये जाते हैं. इसके लिए पात्रों का चयन एक स्वतंत्र समिति करती है. इस बार चयन समिति में पत्रकार निराला व पुष्यमित्र, कार्टूनिस्ट पवन और रंगकर्मी अनीश अंकुर हैं. आयोजन समिति के अरविंद कुमार वर्मा उर्फ छोटू ने कहा कि वे लोग तैयारियों में दिन-रात लगे हुए हैं. उन्होंने कहा कि 38वां आयोजन होने जा रहा है. आज तक कोई दिक्कत नहीं हुई. लोग खुद ही सहयोग करते हैं. आर्थिक रूप से भी और शांति व्यवस्था के लिए भी. यह पूरी तरह से आम जनता का समारोह है. यही वजह है कि करीब 50 हजार की भीड़ होने के बावजूद कोई सुरक्षा व्यवस्था नहीं रहने पर भी आज तक कभी किसी तरह की दिक्कत नहीं हुई.
शोषित समाज दल के राष्ट्रीय महामंत्री रघुनीराम शास्त्री बताते हैं कि रामरूप मेहता के दिल में किसी तरह का भेदभाव नहीं था. प्रसिद्ध चिकित्सक डॉ. रामजतन सिंह कहते हैं कि रामरूप मेहता गांधी और जेपी के परंपरा के राही थे. वे किसी पद पर कभी नहीं रहे, लेकिन गांधी और जेपी की तरह उनका कद किसी भी पद से बड़ा था.
समारोह में अब तक मुख्यमंत्री और मंत्री से लेकर सांसद और विधायक तक शिरकत कर चुके हैं. रामरूप मेहता महोत्सव में मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर, शिक्षा मंत्री रामराज सिंह, कृषि एवं बागवानी मंत्री छेदी पासवान, कारा मंत्री रामविलास पासवान, ग्रामीण विकास मंत्री भगवान सिंह कुशवाहा, वाणिज्य मंत्री ददन पहलवान, सांसद सुशील कुमार सिंह, सांसद महाबली सिंह, विधायक रामशरण यादव, विधायक डीके शर्मा, विधायक राजाराम सिंह, विधायक रणविजय कुमार, विधायक रवींद्र कुमार, विधायक सोमप्रकाश, विधायक चितरंजन कुमार, विधायक सत्यदेव सिंह, विधायक सुरेश मेहता, प्रसिद्ध फिल्म निर्माता निर्देशक अशोकचंद जैन, अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष योगेंद्र पासवान, विधान पार्षद सीपी सिन्हा आदि सहित दर्जनों गणमान्य हस्तियां अतिथि के रूप में पधार चुकी हैं.
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Friday, November 24, 2017

Umar Umar

haspura bazar population| हसपुरा बाजार की पापुलेशन डिटेल्स

Haspura bazar
हसपुरा 
Haspura aurangabad, haspura history, हसपुरा औरंगाबाद,

हसपुरा बजार के संपूर्ण जनसंख्या, जाति, धर्म विवरण - औरंगाबाद जिला, बिहार
औरंगाबाद जिले के हसपुरा ब्लॉक की 2011 के जनसंख्या अनुसार 160,820 की कुल आबादी है । इनमें से 83,350 पुरुष हैं जबकि 77,470 महिलाएं हैं। 2011 में कुल 26,945 परिवार हस्पुरा ब्लॉक में रहते थे। हसपुरा ब्लॉक का औसत लिंग अनुपात 9 2 9 है ।
जनसंख्या 2011 के अनुसार कुल आबादी में 4.9% लोग शहरी इलाकों में रहते हैं जबकि 95.1% लोग ग्रामीण इलाकों में रहते हैं। शहरी इलाकों में औसत साक्षरता दर 83.8% है जबकि ग्रामीण इलाकों में यह 70.8% है। हसनपुरा ब्लॉक में शहरी क्षेत्रों का लिंग अनुपात 902 है जबकि ग्रामीण क्षेत्रों 9 00 है।
हसपुरा ब्लॉक में 0-6 साल की आयु की आयु वर्ग 28 9 2 9 है जो कुल आबादी का 18% है। 14 9 1 पुरुष बच्चे और 13 9 48 महिला बच्चे 0-6 साल के बीच हैं। इस प्रकार 2011 की जनगणना के अनुसार , हस्पपुरा ब्लॉक का बाल लिंग अनुपात 931 है जो हसपुरा ब्लॉक के औसत लिंग अनुपात (9 2 9) से अधिक है
हसनपुरा ब्लॉक की कुल साक्षरता दर 71.46% है । पुरुष साक्षरता दर 66.9 4% है और महिला साक्षरता दर हसपुरा ब्लॉक में 49.64% है।
आबादी
160,820
साक्षरता
71.46%
लिंग अनुपात
929







हसपुरा ब्लॉक डेटा

जनसंख्या 2011 के जनगणना के आंकड़ों के अनुसार, निम्नलिखित कुछ त्वरित तथ्य हैं, जो कि हसपुरा ब्लॉक के बारे में हैं।
कुलनरमहिला
बच्चे (आयु 0-6)28,92914,98113,948
साक्षरता71.46%66.94%49.64%
अनुसूचित जाती38,03419,66218,372
अनुसूचित जनजाति1211 1
निरक्षर66,57027,55639,014

जाति-वार जनसंख्या - हसपुरा ब्लॉक

अनुसूचित जनजाति (अनुसूचित जनजाति) की कुल जनसंख्या का 0%, हसपुरा ब्लॉक में अनुसूचित जनजाति (अनुसूचित जाति) का गठन 23.7% है।
कुलनरमहिला
अनुसूचित जाति38,03419,66218,372
अनुसूचित जनजाति1211 1

धर्म-वार जनसंख्या - हसपुरा ब्लॉक

धर्मकुलनरमहिला
हिंदू139,842(86.96%)72,52667,316
मुसलमान20,256(12.6%)10,4289828
ईसाई102(0.06%)5052
सिख19(0.01%)910
बौद्ध10(0.01%)64
जैन60(0.04%)2931
अन्य धर्म1(0%)10
कोई धर्म निर्दिष्ट नहीं530(0.33%)301229

साक्षरता दर - हसपुरा ब्लॉक

2011 में हसनपुरा ब्लॉक का औसत साक्षरता दर 71.46% था, जिसमें पुरुष और महिला साक्षरता क्रमश: 81.61% और 60.54% थी। हसनपुरा ब्लॉक में कुल साक्षरता 94,250 थी, जिसमें पुरुष और महिलाएं क्रमशः 55,794 और 38,456 थीं।

लिंग अनुपात- हसपुरा ब्लॉक

हसपुरा ब्लॉक का लिंग अनुपात 9 2 9 है। इस प्रकार हज़ारपुरा ब्लॉक में हर 1000 पुरुषों में 9 9 9 महिलाएं थीं। 2011 की जनगणना के अनुसार, शिशु सेक्स रेश्यो 31 था जो कि हसपुरा ब्लॉक के औसत लिंग अनुपात (9 2 9) से अधिक है।

बाल जनसंख्या - हसपुरा ब्लॉक

2011 की जनगणना के अनुसार, हसपुरा ब्लॉक में 0 से 6 साल के बीच 28, 9 2 9 बच्चे थे। इनमें से 28,9 9 पुरुष पुरुष थे जबकि 28, 9 2 9 महिलाएं थीं।

शहरी / ग्रामीण जनसंख्या - हसपुरा ब्लॉक

जनगणना 2011 के अनुसार, शहरी क्षेत्रों में रहने वाले हस्पपुरा ब्लॉक के अंतर्गत कुल 1,400 परिवार हैं जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में 1,400 परिवार रहते हैं। इस प्रकार हसपुरा ब्लॉक की कुल आबादी का लगभग 4.9% शहरी इलाकों में रहता है जबकि ग्रामीण इलाकों में 95.1% लोग रहते हैं। शहरी क्षेत्र में बच्चों की जनसंख्या (0-6 वर्ष) है 1,237 जबकि ग्रामीण क्षेत्र में 27,692 है
कुलशहरीग्रामीण
आबादी160,8207940152,880
बच्चे (0-6 साल)28,9291,23727,692
अनुसूचित जाति38,03482437,210
अनुसूचित जनजाति12012
साक्षरता71.46%83.84%70.8%
लिंग अनुपात929902931

कामकाजी जनसंख्या - हसपुरा ब्लॉक

हसनपुरा ब्लॉक में कुल आबादी के बाहर, 55,651 कार्य गतिविधियां में लगे हुए थे। 45.6% श्रमिक मुख्य कार्य (रोजगार या 6 महीने से अधिक कमाई) के रूप में अपने काम का वर्णन करते हैं, जबकि 54.4% 6 महीने से कम समय के लिए आजीविका प्रदान करने वाली सीमांत गतिविधि में शामिल थे। मुख्य कार्य में लगे 55,651 कार्यकर्ताओं में, 5,365 किसान (मालिक या सह-स्वामी) थे जबकि 11,112 कृषि मजदूर थे।
कुलनरमहिला
मुख्य कामगार25,35819,3146044
किसान53654682683
कृषि मजदूर11,11284782634
घरेलू उद्योग1,489869620
अन्य कार्यकर्ता7,39252852,107
सीमांत श्रमिकों30,29318,39711,896
काम न करने वाला105,16945,63959,530
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Thursday, November 16, 2017

Umar Umar

Amjhar Sharif Dargah is the most attractive Devotee daragah | अमझर शरीफ दरगाह औरंगाबाद जिले का सबसे ऐतिहासिक दरगाह।

Amjhar Sharif is one of the historical Islamic attractions that is popular and famous among all Muslims of the region. Devotees flock this site in large numbers and is considered to be very sacred. And every muslim celebrate as an festival in every year on 1st rabiawal of muslim calendar.





अमझर शरीफ एक बहुत ही बड़ा गांव है जहाँ की अधिकतर आबादी मुस्लिम की है। ये गांव औरंगाबाद जिले की तीर्थस्थल के दृस्टि से एक महत्वपूर्ण जगह है। जी हाँ ये जिले का महत्वपूर्ण इस्लामिक तीर्थस्थान है जहाँ लाखो के सांख्य में हर साल सैयदना दादा के मजरे शरीफ पे चादर पोशी के लिए आते है।।
बात करे इसका लोकेशन का तो अमझर  शरीफ जिला मुख्यालय से ५० कि0 मी0 की दूरी पर हसपुरा प्रखंड मुख्यालय से १ कि0 मी0 दूरी पर स्थित हैा यहॉ कादरी सिलसीला के सूफी संत सैययदना मोहम्मद कादरी १६ वी0 शताब्दी में बगदाद से आये थे।  मोहम्मद शरीफ में सैययदना साहब की खानकाह कादरिया में स्थित हैा गोह स्थित देवकुण्ड एवं अमझर शरीफ संतो के बीच तौहार्दपूर्ण एवं आत्मीया संबंध की परम्परा का आज भी निर्वहन किया जाता हैा स्थानीय लोगों एवं देवकुण्ड मठ के प्रभारी मठाधीश के अनुसार जब भी नये मठाधीश की ताजकोशी देवकुण्ड में होती है तो इसके लिये चादर अमझर शरीफ से जाता हैा चैत नवमी एवं रामनवमी को खानकाह में वृहत मेले का आयोजन किया जाता हैा
प्रत्येक वर्ष 
पहली रविउल्ल अव्वल बाबा सैययदना साहब का सलाना उर्स खानकाह कादरिया में मनाया जाता हैा
खानकाह कादरिया परिसर में पाये जाने वालो अजनाश पौधा के विसय में बताया जात है कि इसे बाबा सैययदना ने अपने साथ बगदाद से ही लाया था ा इसकी विशेसता यह है कि इसके समीप कोई भी जहरीला सापॅ नही आता परन्तु प्रयास के बाद भी इस पौधे को इस परिसर के बाहर नही उगाया जा सकता हैा 
ऐतिहासिक एवं धार्मिक दृष्टिकोण से मशहूर बिहार राज्य के औरंगाबाद जिला अंतर्गत हसपुरा प्रखंड का अमझर शरीफ खानकाह सरकारी और प्रशानिक भेदभाव का शिकार है। इस स्थल को अगर विकसित किया जाता तो पर्यटन के क्षेत्र में इस जगह का अलग नाम  होता। 

ऐतिहासिक महत्त्व हँसपुरा जो की वर्तमान में हसपुरा है, यहां के निवासी शेर अली हिन्दी जब मदीना शरीफ पहुंचे और हजरत मोहम्मद साहब के दरगाह मोबारक के पास खड़े होकर आरजू विनती और दरखास्त की कि मेरे इलाके में अपने खानदान का कोई फर्द हमलोगों के इलाके में इस्लाम धर्म के प्रचार प्रसार करने के लिये भेजा जाय। इस्लाम धर्म के प्रवर्तक मो पैगम्बर साहब (हुजूर SAW)  ने उनको ख्वाब में बताया कि आप बगदाद चले जायें और सैयदना स्मसुदिन दुर्वेश कादरी जो उस वक्त गौस ए पाक के खानकाह के सजादा नशीं हैं, उनके बड़े लड़के सैयदना मोहम्मद कादरी को साथ में लेकर जाओ।  (हुजूर SAW) ने सैयदना मो कादरी के पिता को और सैयदना मो कादरी को ख्वाब में कहा कि तुम अपने बेटे को हिंदुस्तान भेजो और बेटे को कहा कि तुम हिंदुस्तान जाओ।

वहां से सैयदना मो कादरी शेर अली हिन्द के साथ हिंदुस्तान आये। वे लोग रास्ते में कई जगह होते हुए जैसे अफगान,मुलतान होते हुए सुरहुरपुर यू पी आये और कुछ दिनों तक रहे । कुछ समय उपरांत वहां से मगध की धरती नरहना पहुंचे जो अभी हसपुरा प्रखंड में टाल और नरसंद के नाम से जाना जाता है, वहां आकर रहने लगे। वहां जब इनको इबादत में खलल पैदा होने लगी तो ये अमजा जंगल में आकर रहने लगे और इबादत करने लगे। इनके वालिद ने एक सूखी लकड़ी दी थी कि यह लकड़ी को तुम जहां गाड़ दोगे और हरा हो जायेगा, तुम उस जगह इस्लाम धर्म का प्रचार प्रसार करना। उस लकड़ी से अमजा जंगल हरा हो गया। यही अमजा जंगल अमझर शरीफ से मशहूर हो गया।

वह लकड़ी जो हरी हो गई थी उसने सैयदना दादा के मजार के बगल में एक वृक्ष का रूप ले लिया है। इस वृक्ष की विशेषता है कि इसकी लकड़ी को जहां भी रखा जाता है, वहां सांप का बसेरा नहीं होता। यहां आने वाले श्रद्धालु इसकी लकड़ी को बड़े ही जतन और श्रद्धा के साथ अपने पास रखते हैं। 
सैयदना दादा के पिता ने इन्हें यादगारी और तबरुकात के रूप में कुछ चीजें दी थी वो आज भी यहां मौजूद हैं जैसे मो पैगम्बर साहब के दाढ़ी के बाल, मो हजरत साहब के दामाद हजरत अली का कमरबन्द,मो हजरत साहब की बेटी का ओढऩे बैठने का सुजनी,मो साहब के दोनों नातियां का गुलबन्द, हजरत मो साहब के खानदान के एक बुजुर्ग जिनका नाम सैयद मोहिउदिन अब्दुल कादिर गौसपक की टोपी, जां नमाज तस्वी, ओढऩे बैठने की सुजनी और उनके हाथ का लिखा हुए तीस पृष्ठ में पूरा हस्तलिखित कुरानशरीफ जिसे बिना चश्मे के आसानी से पढ़ा जा सके।ये सब चीजें हुजूर मिलत सैयद सरफूदीन नैयर कादरी जो सजादा नसी खानकाह कादरिया मोहम्मदिया के सजादा नसी हैं उनके पास हैं जिसका ज्यारत रबिअवुवल की पहली तारीख को आनेवाले जायरिन को कराया जाता है। इस अवसर पर जियारत में पूरे हिंदुस्तान से लोग आते है। खासकर उड़ीसा, बंगाल, झारखण्ड, यू पी, गुजरात, महाराष्ट्र सहित बिहार के लगभग सभी जिलों से लाखों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं।

 यह उर्स मेले में तब्दील हो जाता है। लोग अपने दिलो में सँजोये सपने को साकार होना देखना चाहते है। सैयदना दादा के मजार पर मन्नतें मांगने वाले लोगो की दिली तमन्ना पूरी होती है। ऐसे तो साल भर लोग प्रतिदिन आते है परंतु जुमा के दिन श्रद्धालुओं का ताँता लगा रहता है। दादा का मुरीद अजगर सांप भी है जो कभी कभी मजार के अगल बगल में देखा जाता है। सोन नदी जो अमजा जंगल होकर गुजरती थी, दादा के प्रताप से सोन नदी का किनारा बदल गया और अरवल होकर गुजरने लगा। आज भी सोन नदी का अवशेष देखने को मिलता है। 

आज भी देवकुंड के च्यवनऋषि और सैयदना दादा का उदाहरण हर बात में इस क्षेत्र के लोग देते है। सैयदना दादा के एक पोता सैयद शाह जकी कादरी की मजार पर भी वर्ष में दो बार चौतनवमी और दुर्गापूजा के अवसर पर दस दस दिनों का विशाल मेला लगता है जहां भूत प्रेत से ग्रसित लोगों को निजात मिलती है। इस मजार के पास लोहे की तीन कड़ी हैं जिसे प्रेत बाधा से ग्रस्त व्यक्ति पकड़ते हैं जब तक उन्हें इससे निजात नहीं मिलती ग्रसित व्यक्ति उसे नहीं छोड़ता। सैयदना दादा के मजार के बगल में मो पैगम्बर साहब के पैर का निशान पथर पर है जिसे लोग पानी से धोकर पीते हैं जिससे लोगों को फायदा होता है। यहां साल में तीन बार मेला लगता है जिसमें लाखों की संख्या में लोग आते हैं परंतु राज्य सरकार या केंद्र सरकार की तरफ से किसी प्रकार की कोई व्यवस्था नहीं की जाती है। जो भी इंतजाम रहने खाने का किया जाता है, वह खानकाह के सजादा नसी नैयर कादरी के द्वारा ही किया जाता है। सैयद जमालुदीन आबिद कादरी जो खानकाह के नाजिमें आला हैं, उन्होंने बताया कि सरकार के द्वारा यहां के नाम पर हसपुरा में पर्यटक भवन बनाया गया लेकिन दूरी की वजह से आने वाले लोगों को कोई फायदा नहीं है। जनसहयोग से इस खानकाह के माध्यम से विशाल अतिथि गृह धर्मशाला का निर्माण कराया जा रहा है। इस दरगाह पर बड़े बड़े राजनेता पदाधिकारीगण आते हैं, दुआ मांगते हैं, मन्नतें भी पूरी होती हैं परंतु इसके विकास के लिये जनप्रतिनिधि या आला हुक्मरानों ने किसी प्रकार कोई पहल नहीं की। जरूरत है इस जगह के पर्यटन स्थल में शामिल करने की ताकि हिंदुस्तान के मानचित्र पर सूफी संतों की जगहों को भी लोग देखकर सबक ले सकें।


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Sunday, February 26, 2017

Umar Umar

Amjhar Sharif aurangabad | अमझर शरीफ शहर का एक महत्वपूर्ण इस्लामी तीर्थस्थल

amjhar sharif
अमझर शरीफ गांव कौन नही जानता बच्चों बच्चों के नाम पे ये नाम होता है कि मैं अमझर शरीफ जाऊंगा और जाकर हज़रत सयिदना दादा के मजारे शरीफ पे चादर पोशी करूँगा। जी बिल्कुल ये स्थान बिहार ही पूरे हिंदुस्तान चर्चित है।
अमझर शरीफ शहर का एक महत्वपूर्ण इस्लामी तीर्थस्थल होने के नाते बहुत बड़ा धार्मिक महत्व रखता है। तीर्थस्थल अमझर शरीफ में स्वर्गीय हजरत सैयादाना मोहम्मद जिलानी अमझरी क़ादरी नामक एक मुस्लिम संत की एक प्राचीन मज़ार (कब्र) बनी है। हजारों मुसलमान जून के पहले सप्ताह के दौरान आयोजित महान संत के उर्स पर इस तीर्थस्थल की यात्रा पर आते हैं। पवित्र अवसर पर बाबा हजरत के पवित्र बाल दर्शन हेतु तीर्थयात्रियों के लिये रखे जाते हैं।
Amjhar Sharif has immense religious significance for being an important Islamic pilgrimage centre of the city. The pilgrimage of Amjhar Sharif is the heavenly abode of an ancient mazaar (grave) of a Muslim saint named Hazrat Saiyadana Mohammad Jilani Amjhari Quadri.
Thousands of Muslims visit this pilgrimage center on the anniversary of the great saint which is held during the first week of June. The Holy hair of Baba Hazrat are on the display for pilgrims on the holy occasion.
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