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Saturday, October 13, 2018

Aurangabadian

देवकुण्ड और उमगा के मंदिर से ज्यादा ऐतिहासिक है अम्बा का ये मंदिर Amba Mandir

amba temple aurangabad.
amba temple aurangabad.






Amba satbahni mandir. अम्बा सतबहनी मंदिर अम्बा औरंगाबाद जिला मगध का महत्वपूर्ण अंग है . जिले में देव सूर्य मंदिर अपनी प्राचीनता के लिए विश्व में जाना जाता है . इसके अलावा देवकुंड उमगा सूर्य मंदिर का भी प्राचीन इतिहास रहा है . आधुनिक युग में भी जिले में कई मंदिर श्रद्धालुओ की आस्था का केंद्र है , जिनमें सर्वाधिक चर्चित मंदिर है अंबा का मां सतबहिनी मंदिर , मां सतबहिनी का मंदिर एनएच 139 सड़क किनारे होने से कई राज्य के श्रद्धालुओं को इनमें गहरी आस्था है .



नवीनगर का गजनाधाम कुडंबा का महुआधाम भी आधुनिक युग में आस्था का चर्चित मंदिर है . उक्त मंदिर में प्रतिदिन श्रद्धालु पहुंचकर पूजा - अर्चना करते हैं . शारदीय नवरात्र में दूर दूर से श्रद्धालु आकर मां सतबहिनी की पूजा कर मन्नतें मांग रहे हैं . सुबह छह बजे से ही मंदिर में पूजा अर्चना करने वालों की भीड़ उमड़ती है . कैसा है मांसतबहिनी का स्तरूप सर्व प्रथम मंदिर के स्वरूप को जानें तो सात बहन व एक भैरो बाबा के पिंड की स्थापना वेदी पर है . ठीक उसके ऊपर चांदी के धातु से प्रतीकात्मक स्वरूप बना है , पूर्व में यहां जिस बरगद के नीचे मां की वेदी थी , उसे भी दक्षिण भारतीय वास्तुकारों ने प्रतिकृति के रूप में उकेरा है . दूसरे तल पर देवी - देवताओं की मूर्तियां जयपुर से मंगा कर लगायी गयी हैं , जो अत्यंत सुंदर हैं . मंदिर के निर्माण में वास्तुकारों ने नागर व द्रविड़ शैली के मिश्रण के साथ किया है .



गुंबद में नागर शैली का प्रतीकात्मक स्वरूप को स्थान दिया गया है , वास्तुकारों ने आधार भाग को वर्गाकार बनाया है . वहीं गर्भग्रह के ऊपर का चारों ओर का भाग पिरामिड नुमा जिससे द्रविड़ शैली का आभास होता है . मंदिर नवीनतम स्थापत्य कला का अनूठा उदाहरण है . नवरात्र में लगती है भक्तों की भीड़ : नवरात्र में मां की पूजा - अर्चना को लेकर भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है . श्रद्धालु मां की वेदी पर चुनरी चढ़ाते हैं . नारियल की बलि देकर देवी की बलि प्रथा का भी पालन किया जाता है . नवरात्र में यहां मेला भी लगता है . मंदिर में पूजा करने आये लोग बताते हैं कि मां की महिमा अपरंपार है जिसने भी सच्चे 


 मन से इनकी पूजा कर इनसे मन्नतें मांगी । वह पूर्ण हुआ है . बच्चे की नौकरी हो या कृषि कार्य सब में मां का स्नेह मिलता है . स्थानीय लोगों ने , कहा कि बगैर आस्था यहां कौन पहुंचता ? जैसे जैसे लोगों ने मां की पूजा अर्चना की मां की शक्ति से सबों ने लाभ पाया है . आज यहां एक से डेढ़ लाख श्रद्धालु आ रहे है शक्तिस्वरूपा मां सतबहिनी स ब क  ी क  ा म न 7 । - मनोकामना पूर्ण करने के वाली हैं . 


मां की कृपा से लौट आयी थी आंखों की रोशनी 
पूर्व में एनएच 139 के किनारे बरगद के पेड़ के नीचे सातो देवी का पिंड था . अंबा स्थित मां सतबहिनी की एक कथा प्रचलित है . लोग बताते है पूर्व में चिल्हकी के एक जमींदार हुआ करते , जिनका नाम महाराजा पांडेय था . महाराजा पांडेय के परिवार के किसी सदस्य की आंखर्यों की रोशनी चली गयी थी जिसके बाद उसी बरगद का दूध महाराजा पांडेय के परिजन के आंख में डालने के बाद उनकी रोशनी लौट आयी उसी रात उन्हें मां सतबहिनी ने स्वन दिया . स्वन में मां ने श्री पांडेय को उसी जगह पर मंदिर का निर्माण कराने को कहा . इसके बाद उनके द्वारा भव्य मंदिर का निर्माण कराया input prabhat khabar 





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Thursday, October 11, 2018

Aurangabadian

आस्था व विश्वास का प्रतीक है औरंगाबाद के उमगा मंदिर Umga temple is the symbol of faith and trust

umga temple Aurangabad
umga temple Aurangabad

उमगा मंदिर औरंगाबाद। umga temple Aurangabad औरंगाबाद जिले के मदनपुर थाना क्षेत्र में उमगा पहाड़ पर स्थित मां उमंगेश्वरी का स्थान आस्था व विश्वास का प्रतीक है . पर्यटन के दृष्टिकोण से अति महत्वपूर्ण उमगा तीर्थस्थान पूरे क्षेत्र विख्यात है .


मनोरम प्रकृति के बीच हजारों वर्ष पूर्व निर्मित मंदिरों व उनमें स्थापित देवी देवताओं के दर्शन कर श्रद्धालु अपने आप को धन्य मानते हैं . उमगा सूर्य मंदिर में अवस्थित शिलालेख में वर्णित है ' याते तर्क नवाग्र बुद्धिन गुणिते सम्वत् सरे विक्रमे वैशाखे गुरू वासरे शिवशरे पक्षे तृतीय तिथौ रोहिण्यां पुरुषोत्तम भुद्रा सुभद्रा प्रतिष्ठान पथदैक देव विधिनः श्री भैरवेंद्रण इन तथ्यों को अवलोकन करने मात्र से ही यह स्पष्ट हो जाता है कि विक्रम संवत 1946 वैशाख तृतीया गुरुवार के दिन उमगा राज्यवंश के 13 वें खानदान के राजा भैरवेंद्र ने भगवान जनार्दन बलिराम व सुभद्रा की प्राण प्रतिष्ठा देव विधान से विद्वान पंडितों द्वारा करायी थी


. और शेर को मारा था अइल ने 
उमगा का इतिहास काफी पुराना है . यूं तो जैसा कि नाम से ही स्पष्ट होता है कि उमगा उमंगा का ही विकृत रूप है . उमगा राज्य अपने था , समय वांकुड़े राजे रजवाड़े मास में खेलने चरमोत्कर्ष उस वीर सावन आखेट के लिए पूरे भारत वर्ष से इस पर आया करते थे आखेट कौशल का आनंद ऐसा कहीं नहीं मिलता था , तभी तो इसका नाम उमंगा रखा गया था . प्राचीन ग्रंथों व शोधों से जो बातें सामने आयी उसके अनुसार यह क्षेत्र कोल - भीठम आदिवासी राजा दुर्दम का क्षेत्र था . शुरू में अइल व इल नामक दो भाई आखेट खेलने आये थे . आखेट के दौरान अपनी बहादुरी से दोनों भाइयों ने शेर को पटक कर मार दिया था . इससे प्रभावित राजा ने प्रसन्न होकर अपनी एकमात्र पुत्री की शादी अइल से कर दी . साथ ही घर जमाई बना कर रखना कबूल करवा लिया . दूसरे भाई अपने देश चले गये . 

उमगा पहाड़ पर हैं 52 मंदिर

 उमगा पहाड़ पर 52 मंदिरों की श्रृंखला है . उमगा पहाड़ स्थित सूर्य मंदिर मां उमंगेश्वरी मंदिर गौरी शंकर मंदिर का अपना इतिहास है . पहाड़ पर बहुमूल्य मूर्तियों की भरमार है . पहाड़ पर प्राकृतिक छटा देखते ही बनती है .


कलाकृतियों व ऐतिहासिक धर्मस्थल की भरमार है बिखरी पड़ी मूर्तियों के संग्रह के लिए एक संग्रहालय का होना आवश्यक है . यह पहाड़ी पर्यटन के मानचित्र से दूर है . सदियों से उमगा मंदिर विख्यात रहा है . इसकी पुष्टि 18वीं सदी के ब्रिटिश चित्रकार विनियम डेनियल ने भी उमगा आकार मंदिर की पेंटिंग बनाकर कर दी है . पहाड़ी के नीचे तलहटी में सड़क से लगा हुआ पोखरा भी है . उमंगश्वरी मंदिर में वैष्णव और शाक्त सभी एक ही छत के नीचे हैं . मां के बगल में मार्तड भैरव की मूर्ति है . यह दुर्लभ स्थान है , क्योंकि शाक्त और वैष्णव की पूजा एक साथ होती है . भगवती उमंगेश्वरी के मंदिर में श्रद्धालुगण बली पूजा कर अपनी कामना सिद्ध करते हैं . मां के बगल में मार्तड भैरव है . उनकी पूजा वैष्णव रूप में की जाती है . मनोकामना पूर्ण होने पर मां को भक्तगण ढकना में मिट्टी के बर्तन ) चावल के आटे का भेड़ा का स्वरूप बनाकर भोग लगाते । और मां को प्रसन्न करते हैं .


यह ऐसा दुर्लभ स्थान है कि लाखों टन काचट्टान एक छोटा से बिंदु पर टिका हुआ , जो एक रहस्य है . यहां पर श्रद्धालु विशेष रूप से माघ माह के गुप्त नवरात्र में अपनी मनोकामना लेकर मां के दरबार में आते है और उनकी मनोकामाना पूर्ण भी होती है . 
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Saturday, October 6, 2018

Aurangabadian

चाल्हो पहाड़ औरंगाबाद का एक दर्शनीय वाटर फॉल chalho mountain Aurangabad

चाल्हो पहाड़ औरंगाबाद chalho mountain
चाल्हो पहाड़ औरंगाबाद chalho mountain
चाल्हो पहाड़ औरंगाबाद बिहार चाल्हो पहाड़ औरंगाबाद chalho mountain aurangabad बिहार के औरंगाबाद जिले में कई ऐसे वनिय क्षेत्र हैं जो लोगों को खूब रिझाते हैं.ऐसा ही एक मनोरम और प्राकृतिक सौंदर्य से संपूर्ण स्थल है चाल्हो वाटर फॉल.

यह जल प्रपात जिला मुख्यालय से 30 किलोमीटर की दूरी पर चाल्हो पहाड़ के ऊपर प्रकृती की गोद में अवस्थित है. प्राकृतिक जल प्रपात और उसके आस पास का प्राकृतिक सौंदर्य देखते बनता है. जहां साल के ४ ५ महीनें चाल्हो पहाड़ की इस ऊँचाई पर शितल जल का यह झरणा अपनी शितलता प्रदान करता है .चाल्हो पहाड़ सात पहाड़ों की एक मिलन श्रृंख्ला है, इसी श्रृंख्ला पर अवस्थित है ये झील, ओर यही झील इस जल प्रपात का श्रोत है. गर्मीयों के मौसम में भी जहां मैदानी जमीन पर कई ऐसे जगह हैं जहां पानी के लिए हाहाकार मच जाता है,वहां ऊपर पहाड़ पर यह झील चाहे जंगली जानवर पशु पच्छी हो या ईंसान सबको अपना शितल और शुद्ध जल बिना किसी भेद भाव के सैंकड़ो वर्षो से उपलब्द करा रहा है.
जिले के मदनपुर प्रखंड क्षेत्र के उत्तर पूर्व भाग में जिला मुख्यालय से 30 किलोमीटर दूर अवस्थित है चाल्हो पहाड़ के ऊपर यह प्राकृतिक वाटरफॉल. यहां का प्राकृतिक सौंदर्य संपूर्ण इलाके में वर्णित है . चाहे त्यौहार हो या और भी कोई अवसर लोग पूरे परिवार को साथ लेकर पिक्निक मनाने बरियावां गांव के पास चाल्हो पाहाड के इस वाटरफॉल पर चले आते हैं . परंतु यह दिगर बात है कि आज तक इस जगह को पर्यटक स्थल बनाने की दिशा में कोई भी कदम नहीं उठाया गया है . इस क्षेत्र को पर्यटक स्थल के रूप में विकसित किया जाए तो यह संभव है कि दूर दराज से पर्यटक यहां की अलौकिक प्राकृतिक संरचना के दीदार को खींचे चले आएंगे .

यह अपनी सुंदरता की छटा ऐसी बिखेरेगा कि लोगों को यह खूब रिझायेगा . इसका कारण यह है कि वाटरफॉल दोनों तरफ से पहाड़ियों से घिरा हुआ है , जिसकी अद्भुत बनावट , अद्वितिय हरियाली और बड़े क्षेत्र में फैला होना इसकी खूबसूरती में चार चांद लगाता है . ऐतिहासिक मानव घाट मन्दिर से महज थोड़ी दूर पर स्थित यह वॉटरफाल आसपास छोटे-छोटे चट्टानो और हरे भरे पेड़ों से आच्छादित है . जो की पिक्निक मनाने के लिए बिलकुल उपयुक्त जगह है . वहीं पाहाड़ पर कल कल करती जलधारा और पत्थरों की खूबसूरत बनावट भी लोगों को खूब लुभाती है . इसके अलावा ऊपर बने झील और पहाड़ियां भी लोगों को आकर्षित करती है. जल का प्राकृतिक श्रोत ,समुचित भण्डारण ओर पहाड़ के ऊपर चट्टान निर्मीत गुफाओं के कारण ही यह नेपथ्य में उग्रवादियों के भी पसन्दिदा ठिकानों मे से एक रहा है.
और लाल आतंक के कारण ही आजतक यह इलाका पर्यटन के पैमाने पर फिट नहीं आ सका है


चाल्हो वाटरफॉल के अतिरिक्त मदनपुर प्रखंड क्षेत्र में पर्यटन के लिहाज से ऐसे ही उपेक्षित है उमगा,सिताथापा और हद हदवा वाटरफॉल . ये सभी स्थल भी लोगों को खूब रिझाती है जहां बनि मंदिर, तालाब आदि देखने दूर दराज से लोग आते हैं. अगर इन जगहों पर सरकार की ओर से व्यवस्था मुहैया करा दी जाए तो लोग जुटेंगे और सरकार को भी राजस्व का फायदा होगा.

वर्ष ऊन्निस सौ अस्सी से पहले लोग यहां पिक्निक मनाने आया करते थे.

अस्सी के दशक में चाल्हो को नक्सल के सेफ जोन के रूप में जाना जाता था .कभी यहां नक्सलियों को प्रशिक्षण दिया जाता था .ग्रामीणों ने बताया कि अस्सी के दशक में मोहम्मद अंसार मियां इस इलाके के जमींदार हुआ करते थे और यहां उनका कचहरी हुआ करता था.
लोगो ने बताया कि पाहाड़ पर पानी को एकत्रित करने के लिये पाहाड़ के ऊपर तालाब बनाया गया है जिसका पानी ही वॉटरफाल में आता है .फिर पानी पाहाड़ के नीचे बने आहर में एकत्रित होता है . जिसके पानी से करीब 20 स 30 गांव के लोगो की खेती होती है. इस पानी के लिये नगवां गढ़ और जमींदार अंसार मिया के साथ कई बार लड़ाईयां भी हुई है .लेकिन ऊन्निस सौ अस्सी के बाद इस इलाके में नक्सली धमक सुनाई देने लगा और नक्सली साम्राज्य कायम हो गया .तब से इस इलाके में लोग यहां आने से डरने लगे .अब फिर से इस इलाके में लोग पिक्निक का आनंद ले रहे है. बता दें कि यह वाटर फॉल बरसात माह में शुरू होकर माघ माह तक चलता है

नक्सली साये में होना बताई गई विकसित ना होने की वजह



चाल्हो इलाके को विकसित न होने की वजह अक्सर नक्सल प्रभावित इलाके में होना बताया जाता है . परंतु वास्तविक स्थिति इससे कोसों दूर है .लगातार इन इलाकों में पुलिस मूवमेंट होने की वजह से नक्सली इन क्षेत्रों में आने से डरते हैं. परंतु अभी भी नक्सली को कारण बता कर इसके विकास से पल्ला झाड़ लिया जाता है . अब देखना यह है कि क्या कभी इस क्षेत्र का विकास पर्यटन स्थल के रुप में किया जा सकेगा? या ऐसे ही नक्सल प्रभावित हौने का दर्द झेलता रहेगा यह स्वपनीम स्थल.


स्थानीय निवासीयों ने बताया कि इसके पानी पीने से लोगो की पेट की बीमारी ठीक हो जाती है. राजू यादव, संजय यादव, अनिल मेहता ईत्यादी लोगों ने कहा कि बहुत ही सुंदर जगह है अगर इसका विकास हो तो काकोलत, तुतला धाम,माझर कुंड की तरह यहां भी लोग पहुँचेंगे.
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